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Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Summary/Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Question Answer/किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

 


किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया कक्षा 9 पाठ का सारांश

Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Summary ,
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    Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Summary

    किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया का सारांश

    इस कहानी के लेखक शमशेर बहादुर सिंह जी हैं।इस कहानी में लेखक ने अपने जीवन के उन तमाम घटनाक्रमों का जिक्र किया है जिसके फलस्वरूप उन्होंने हिंदी साहित्य जगत में कदम रखा और हिन्दी लेखन कार्य आरंभ किया और खूब सारी कविताएं , निबंध और कहानियां लिखकर प्रसिद्धि कमाई। अपने इस लेख में लेखक ने श्री हरिवंश राय बच्चनजी , सुमित्रानंदन पंतजी , निरालाजी का दिल से आभार प्रकट किया है।

    कहानी की शुरुआत करते हुए लेखक शमशेर बहादुर जी कहते हैं कि वो जिस स्थिति में थे उसी स्थिति में अपने घर से पहली बस पकड़कर दिल्ली के लिए रवाना हो गए। दिल्ली पहुंच कर  उन्होंने तय किया कि उन्हें कोई न कोई काम अवश्य करना है। इसीलिए वो अपनी इच्छानुसार पेंटिंग की शिक्षा लेने उकील आर्ट स्कूलपहुंचे। परीक्षा में सफल होने के कारण उन्हें बिना फीस दिए ही वहाँ प्रवेश मिल गया।

    लेखक ने करोलबाग में सड़क किनारे एक कमरा किराए में लिया और वहीं से वो पेंटिंग सीखने कनाट प्लेस जाते थे। पेंटिंग क्लास जाने और आने के रास्ते में वो अपना अधिकतर समय कभी ड्राइंग बनाकर तो कभी कविताएं लिखकर गुजारा करते थे।

    हालाँकि उन्हें इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि कभी उनकी कविताएं प्रकाशित होगी। आर्थिक हालत अच्छे न होने के कारण कभी-कभी लेखक के बड़े भाई तेज बहादुर उन्हें कुछ रुपए भेज देते थे और कुछ रुपए लेखक स्वयं साइन बोर्ड पेंट करके भी कमा लेते थे।

    कुछ समय बाद लेखक के एक तीस-चालीस वर्ष के महाराष्ट्रीयन पत्रकार मित्र उनके साथ आकर रहने लगे।लेखक उस वक्त कभी कविताएं और कभी उर्दू में गजल के कुछ शेर भी लिख लिया करते थे।

    लेखक की पत्नी का देहांत टी.बी नामक बीमारी के कारण हो चुका था। इसीलिए वो अपने आप को बिल्कुल अकेला महसूस करते और दुखी रहते थे। पेंटिंग करना , कविताएं लिखना , उनका जीवन बस इन्हीं तक सीमित रह गया था।

    एक बार लेखक अपनी क्लास खत्म होने के बाद घर जा चुके थे। तब बच्चन जी उनके स्टूडियो में आए और लेखक को वहां ना पाकर उनके नाम एक नोट छोड़ कर चले गए। लेखक कहते हैं कि उनकी एक बहुत बुरी आदत थी कि वह कभी भी किसी के भी पत्रों का जवाब नहीं देते थे। लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने बच्चन जी के लिए एक अंग्रेजी का सॉनेट लिखा। लेकिन वह उसे बच्चन जी को भेज नहीं पाए।

    इसके बाद लेखक अपनी ससुराल देहरादून आ गए। जहां उन्होंने एक केमिस्ट की दुकान में कंपाउंडरी सीखी । और एक दिन अचानक उन्होंने अंग्रेजी में लिखा अपना वह सॉनेट बच्चन जी को भेज दिया।

    बात सन 1937 की हैं जब बच्चनजी गर्मियों की छुट्टियों में देहरादून आए और बृज मोहन गुप्ता के यहां ठहरे। और फिर एक दिन वो बृज मोहन गुप्ता के साथ उनकी केमिस्ट की दुकान में आकर उनसे मिले। लेखक बताते हैं कि उस दिन मौसम खराब था और आँधी आने के कारण वो एक गिरते पेड़ के नीचे आते-आते बच गए।

    इस छोटी सी मुलाकात में लेखक का बच्चन जी के साथ एक व्यवहारिक रिश्ता जुड़ गया था ।लेखक कहते हैं कि बच्चनजी की पत्नी का भी देहांत हो चुका था। इसीलिए वो भी बहुत दुखी रहते थे। उनकी पत्नी उनके सुख-दुख की संगिनी थी। वह विशाल हृदय की मलिक्का व बात की धनी महिला थी।

    लेखक की मनोदशा देखकर बच्चनजी ने उन्हें इलाहाबाद आकर पढ़ने की सलाह दी और उनकी बात मान कर लेखक इलाहाबाद पहुंच गए। बच्चन जी ने लेखक को M.A में प्रवेश दिला दिया।

    इलाहाबाद में लेखक को बच्चनजी व उनके परिवार से बहुत सहयोग मिला। बच्चनजी के पिताजी ने लेखक को उर्दू-फारसी की सूफी नज्मों का एक संग्रह भी भेंट किया। बच्चनजी ने स्वयं भी M.A अंग्रेजी विषय से किया था लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं की। लेखक का भी सरकारी नौकरी के प्रति कोई रुझान नहीं था। इसीलिए वो भी सरकारी नौकरी से दूर ही रहे।

    लेखक आगे कहते हैं कि श्री सुमित्रानंदन पंतजी की सहायता से उन्हें हिंदू बोर्डिंग हाउसके कॉमन रूम में एक सीट फ्री मिल गई थी।और इसी के साथ ही उन्हें पंत जी की सहायता से इंडियन प्रेसमें अनुवाद का काम भी मिल गया था।

    यहीं से लेखक ने हिंदी कविताओं व लेखन कार्य को गंभीरता से लेना आरंभ किया। लेखक के परिवार में उर्दू का माहौल होने के कारण उन्हें उर्दू का अच्छा ज्ञान था। लेकिन उनका हिंदी लिखने का अभ्यास बिल्कुल ही छूट चुका था।बच्चन जी की मदद से उन्होंने पुन: हिंदी लिखने में महारत हासिल की। 

    उनकी कुछ रचनाएं सरस्वतीऔर चाँदमें भी छप चुकी थी। अभ्युदयमें छपा उनका एक सॉनेटबच्चन जी को बहुत पसंद आया। लेखक कहते हैं कि उन्हें पंतजी और निरालाजी ने हिंदी की ओर आकर्षित किया । अब बच्चनजी भी हिंदी में लेखन कार्य शुरू कर चुके थे।

    लेखक को लगा कि अब उन्हें भी हिंदी में लेखन कार्य करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। लेखक लाख कोशिशों के बाद भी M.A. नहीं कर पाए जिसका बच्चनजी को बहुत दुख था।

    लेखक ने अब हिंदी कवितायें लिखनी आरम्भ की और उनके प्रयास सार्थक भी हो रहे थे। सरस्वतीपत्रिका में छपी लेखक की एक कविता ने निराला जी का ध्यान खींचा। इसी के साथ ही  लेखक ने कुछ और निबंध भी लिखें।

    लेखक के अनुसार उनके हिंदी साहित्य जगत में फलने फूलने के पीछे बच्चनजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

    लेखक कहते हैं कि बाद में वो निश्चित रूप से बच्चन जी से दूर ही रहे क्योंकि उन्हें चिट्ठी-पत्री तथा मिलने जुलने में अधिक विश्वास नहीं था लेकिन बच्चनजी हमेशा उनके बहुत निकट रहे।

    लेखक कहते हैं कि बच्चनजी का व्यक्तित्व उनकी श्रेष्ठ कविताओं से भी बहुत बड़ा व अद्भुत है। बच्चनजी जैसे व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति इस दुनिया में कम ही होते हैं।


    किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया पाठ के प्रश्न उत्तर | Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Question Answer


    प्रश्न 1.

    वह ऐसी कौन सी बात रही होगी जिसने लेखक को दिल्ली जाने के लिए बाध्य कर दिया ?

    उत्तर-

    लेखक उन दिनों बेरोजगार थे। हो सकता है काम की तलाश में वो दिल्ली गए हो। या बेरोजगार होने की वजह से किसी ने उन्हें ताना मारा हो या उनकी बेरोजगारी का मजाक बनाया हो , जिसे लेखक बर्दाश्त नहीं कर पाए और दिल्ली चले गए।

    प्रश्न 2.

    लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस क्यों रहा होगा ?

    उत्तर-

    उस समय अंग्रेजी आम भारतीय जनमानस की भाषा नहीं थी। ज्यादातर भारतीय इस भाषा को न तो समझ पाते थे और नहीं बोल पाते थे। इसीलिए लेखक के द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई कविताओं को अधिकतर लोगों ने नहीं पढ़ा होगा जिसका लेखक को अफसोस रहा होगा।

    प्रश्न 3.

    अपनी कल्पना से लिखिए कि बच्चन ने लेखक के लिए नोटमें क्या लिखा होगा ?

    उत्तर-

    दिल्ली के उकील आर्ट स्कूलमें बच्चनजी की जब लेखक से भेंट नहीं हुई तो वो लेखक के नाम एक नोट छोड़ कर गए थे। उस नोट में शायद बच्चनजी ने लेखक से मिलने की इच्छा जताई हो और उन्हें अपने लेखन कार्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया हो।

    प्रश्न 4.

    लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व के किन-किन रूपों को उभारा है ?

    उत्तर-

    लेखक ने बच्चनजी के व्यक्तित्व के अनेक रूपों को उभारा है।

    1.   लेखक कहते हैं कि बच्चनजी अद्भुत व्यक्तित्व के मालिक थे। लेकिन स्वभाव से बहुत ही सरल , मिलनसार , परोपकारी व दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति थे।

    2.   लेखक के अनुसार बच्चनजी का व्यक्तित्व उनकी श्रेष्ठ कविताओं से भी बड़ा व महान था।

    3.   बच्चनजी ने लेखक की लेखन कला की प्रतिभा को उनके द्वारा लिखे गए एक सॉनेट को पढ़कर ही पहचान लिया था।

    4.   लेखक उन्हें बहुत ही सहृदय व्यक्ति मानते हैं क्योंकि बच्चनजी ने लेखक को M.A की पढ़ाई करने तथा लेखन कार्य में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया था।

    प्रश्न 5.

    बच्चन के अतिरिक्त लेखक को अन्य किन लोगों का तथा किस प्रकार का सहयोग मिला ?

    उत्तर-

    लेखक को अपने जीवन में अनेक लोगों से सहयोग प्राप्त हुआ।

    1.   लेखक के बड़े भाई तेज बहादुर सिंह कभी-कभी रुपए भेज कर उनकी आर्थिक मदद किया करते थे।

    2.   लेखक के परम मित्र कवि नरेंद्र शर्मा ने एक नोट के माध्यम से लेखक को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी थी ।

    3.   उकील आर्ट स्कूल के मालिक शारदाचरण उकील से उन्होंने पेंटिंग की शिक्षा हासिल की।

    4.   हरिवंश राय बच्चनजी के पिताजी इलाहाबाद में उनके स्थानीय अभिभावक बने। उन्होंने लेखक को सूफी नज्मों का एक संग्रह भी भेंट किया।

    5.   सुप्रसिद्ध कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी ने लेखक को इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम दिलाया।

    प्रश्न 6.

    लेखक के हिंदी लेखन में कदम रखने का क्रमानुसार वर्णन कीजिए।

    उत्तर-

    सन 1933 में लेखक द्वारा लिखी गई कुछ रचनाएं स्वरस्वतीचांदपत्रिका में छपी थी।  बच्चन जी द्वारा रचित निशा निमंत्रणसे प्रेरित होकर लेखक ने भी एक कविता लिखी थी।

    सरस्वतीपत्रिका में छपी उनकी एक कविता ने निराला जी का ध्यान आकर्षित किया। लेखक ने इसके बाद कुछ हिंदी निबंध भी लिखे। इसके बाद लेखक हंसकार्यालय की कहानीमें चले गये। जहां उन्होंने अनेक कहानियों , कविताओं और अन्य रचनाओं की रचना की।

    प्रश्न 7.

    लेखक ने अपने जीवन में जिन कठिनाइयों को झेला है , उनके बारे में लिखिए।

    उत्तर-

    लेखक ने अपने जीवन के प्रारंभिक काल से ही अनेक कठिनाइयों का सामना किया। बेरोजगारी और लोगों के तानों से तंग आकर वो बिना सोचे समझे दिल्ली चले गए। आर्थिक तंगी के चलते उन्हें साइन बोर्ड पेंट करके अपना गुजारा करना पड़ता था।

    टी.बी के चलते लेखक की पत्नी की मृत्यु युवावस्था में ही हो गई जिसके कारण लेखक एकदम अकेले व दुखी हो गए थे। देहरादून आने के बाद लेखक ने एक केमिस्ट की दुकान में कंपाउंडरी का कार्य आरम्भ किया। फिर बच्चन जी के बुलाने पर वो इलाहाबाद पहुंच गए जहां उन्होंने M.A में  प्रवेश लिया जिसका खर्चा बच्चनजी ने ही उठाया। लेकिन पढ़ाई में मन न लगने के कारण वो M.A भी पूरा नहीं कर पाए।सुमित्रानंदन पंत जी की वजह से उन्हें इंडियन प्रेस में अनुवाद का कार्य मिल गया। बाद में हिंदू बोर्डिंग हाउसके कॉमन रूम में उन्हें एक सीट फ्री मिल गई। लेखक ने अपने जीवनकाल में अनेक निबंध , कविता व कहानियों की रचना की लेकिन उनका पूरा जीवन संघर्षमय ही रहा।

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